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व्रत और उपवास एक डाइटिशियन की नजर से डॉ अर्चिता महाजन* डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रिशन

*व्रत और उपवास एक डाइटिशियन की नजर से डॉ अर्चिता महाजन* डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रिशन

डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर ने बताया कि हमारे देश में बहुत ही अच्छी परंपराओं और प्रथाओं को विश्वास के साथ जोड़ दिया गया और यही बाद में धर्म के साथ जोड़कर एक ऐसा विषय बन गया जिस पर कभी किसी ने रिसर्च तो छोड़े चर्चा करने की भी जरूरत नहीं समझी । और जिसने इस पर रिसर्च की उस जापानी विज्ञानी को नोबेल पुरस्कार मिल गया। अच्छा सुनो आप उसने अपनी रिसर्च में क्या कहा और कैसे हमारे विश्वास और धर्म से अलग है। उसने अपनी रिसर्च में कहा हमारे शरीर कोशिकाओं से बना है और यदि कोई भी व्यक्ति 3 दिन तक कुछ ना खाए तो स्वस्थ कोशिकाएं बीमार कोशिकाओं को अपने आप खा जाती हैं। और उसने यह तक भी कहा कि कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को भी स्वस्थ कोशिकाएं खा जाती हैं। अब बताओ व्रत और उपवास भारतीय संस्कृति का वह विज्ञान है जिसे प्रमाणित कर जापान के लोगों ने नोबेल पुरस्कार ले लिया71 साल केजापानी साइंटिस्ट योशिनोरी ओशुमी को सोमवार को बॉडी सेल पर नए रिसर्च के लिए मेडिसिन फील्ड का नोबेल देने का एलान किया गया। ओशुमी ने बॉडी सेल की ‘सेल्फ ईटिंग या ऑटोफैगी’ प्रोसेस को नए तरीके से समझाया है। इनकी खोज से फ्यूचर में पार्किंसन, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज को समझने में मदद मिलेगी।क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को साफ करना: Autophagy क्षतिग्रस्त या असामान्य कोशिकाओं को साफ करने में मदद करती है, जिससे कैंसर कोशिकाओं के निर्माण को रोका जा सकता हैऑक्सीडेटिव तनाव को कम करना: ऑटोफैगी ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में मदद करती है, जो कैंसर के विकास का एक ज्ञात कारक है। सेल के विकास और उत्तरजीविता को विनियमित करना: ऑटोफैगी सेल के विकास और उत्तरजीविता को विनियमित करने में मदद करता है, जो कैंसर कोशिकाओं के अनियंत्रित प्रसार को रोक सकता है। विशेष रूप से कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करना: ऑटोफैगी को विशेष रूप से कैंसर कोशिकाओं में ट्रिगर किया जा सकता है, जिससे सेलुलर गिरावट के माध्यम से इन कोशिकाओं को खत्म किया जा सकता है।सूजन कम करना: ऑटोफैगी सूजन को कम करने में मदद करती है, जिसे कई प्रकार के कैंसर के विकास और प्रगति से जोड़ा गया है।ऑटोफैगी उपवास कोशिका के भीतर पोषक तत्वों की कमी की स्थिति बनाकर काम करता है। यह ऑटोफैगी को ट्रिगर करता है, क्योंकि सेल टूटने लगती है और ऊर्जा के स्तर को बनाए रखने के लिए सेलुलर घटकों को रीसायकल करती है। उपवास के माध्यम से नियमित रूप से ऑटोफैगी को प्रेरित करके, यह माना जाता है कि सेलुलर रीसाइक्लिंग प्रक्रिया को बढ़ाया जा सकता है, जिससे सेलुलर स्वास्थ्य में सुधार होता है और संभावित रूप से लंबा जीवनकाल होता है।ऑटोफैगी को सेल्स की सेल्फ ईटिंग भी कहते हैं। यह कंसेप्ट 1960 के दशक में पहली बार रिसर्च में सामने आया। इसमें पता चला कि सेल्स खुद को ही खा जाती हैं। और शरीर से विषैले तत्व को खत्म करती हैं या उनकी मरम्मत करती हैं। यह कोशिकाओं की रिसाइकिलिंग है।

ऑटोफैगी बॉडी का नेचुरल डिफेंस मैकेनिज्म है, जो जिंदा रहने में मदद करता है। यह शरीर को बिना खाने के जीवित रहने और बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में मदद करती है।

ऑटोफैगी के नाकाम होने के बाद ही शरीर में बुढ़ापा या पागलपन जैसे सिमटम्स नजर आते हैं।अगर यह डिस्टर्ब हो जाए तो पार्किंसन, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों होती हैं।

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