भारत अब पाकिस्तान को हर एक मोर्चे पर #अस्थिर कर रहा है, चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनीतिक या फिर भौगोलिक क्षेत्र हो. लेकिन वह #सैन्य कार्यवाही जरुर करेगा, यह बात गांठ बांध कर रख लिजिए.
चार दिन का हथियारों का स्टॉक है क्योंकि सेना देश के हथियार यूक्रेन को बेचकर खा गए


भारत अब पाकिस्तान को हर एक मोर्चे पर #अस्थिर कर रहा है, चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनीतिक या फिर भौगोलिक क्षेत्र हो. लेकिन वह #सैन्य कार्यवाही जरुर करेगा, यह बात गांठ बांध कर रख लिजिए.
वर्तमान में, जहां जहां से जो भी संकेत मिल रहे हैं, वे सभी इसी और इंगित कर रहे हैं, कि भारत इन सभी मसले का एक बड़े प्रतिकार की ओर बढ़ रहा है. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. दुसरी बात, यदि हम भारत के NSA अजित डोभाल साहब के सोच का अध्ययन करें, तो यही समझ में आता है कि उन्हें सैन्य कार्यवाही अनिवार्य लगती है. जब IB के निर्देशक के रूप में अजित डोभाल साहब काम करते थे, तब इंटेलिजेंस ब्यूरो IB के इस पूर्व निदेशक को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग R&AW के पूर्व प्रमुख रहे एएस दुलत साहब ने उन्हें “आक्रामक अजीत डोभाल” के रूप में वर्णित किया था. तत्कालीन भूमिगत मिजो नेशनल फ्रंट में घुसपैठ कर उसके शीर्ष कमांडरों को अपने पक्ष में करना; 1988 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर से महीनों पहले खुफिया जानकारी प्राप्त करने के लिए एक पाकिस्तानी एजेंट के रूप में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करना; और पाकिस्तान में सात वर्षों तक सेना में एक अफसर के तौर पर ड्यूटी करना, उनकी काबलियत को दर्शाता है. डोभाल साहब अपनी आस्तीन चढ़ाकर कार्रवाई करने में संकोच नहीं करते. जहां पर कोई मिशन बेहद सरलता से सम्पन्न हो चुके हो, वे वहां भी सैन्य प्रदर्शन करने से हिचकिचाते नहीं हैं. यह एक वास्तविक कार्य करने वाले व्यक्ति है, जिसे हमने पहले कभी देखा नहीं है.
डोभाल साहब की यह शैली उनके बॉस नरेंद्र मोदी जी के अनुकूल है, जो यह साबित करने में लगे हैं कि वे अपने सभी पूर्ववर्तियों से अलग हैं, उन्हें डोभाल का दृष्टिकोण और सक्रियता बहुत पसंद है. 7 जुलाई, 2014 को, नई दिल्ली में 1-AB पुराना किला रोड पर भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह UNMOGIP को अपना बंगला खाली करने और अपना काम बंद करने के लिए कहा गया था. और उन्होंने भारत के आगे झुकते हुए अपना ऑफिस भारत में बंद कर दिया था. तब संयुक्त राष्ट्र शांति सेना प्रमुख हर्वे लैडसौस ने नई दिल्ली को बताया कि UNMOGIP संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार यहां है और इसका अधिदेश केवल सुरक्षा परिषद द्वारा ही रद्द किया जा सकता है..!! पिछले कई बरसों से अमित शाह और भाजपा ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के प्रति अपना कमिटमेंट निर्भीकता से व्यक्त किया है. फरवरी 2014 में डोभाल साहब ने कहा था कि “पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है जो हमें लगातार नुकसान पहुंचा रहा है. अगर हमारे घर में हालात बहुत खराब हो जाएं तो क्या होगा ? हम क्या करेंगे ? हमें ऐसा समाधान खोजना होगा जो दीर्घकालिक, टिकाऊ और किफायती हो !! इसलिए, सबसे पहले वास्तविकता को स्वीकार करें. दूसरा समस्या को परिभाषित करें. और फिर हमें प्रतिक्रिया देनी चाहिए. अगर हम प्रतिक्रिया की बात करें तो हमें समझना होगा कि आतंकवाद क्या है. आम तौर पर, जब हम आतंकवाद की बात करते हैं, तो इसे मूर्खतापूर्ण, अमानवीय आदि कहा जाता है. हां, ऐसा है, लेकिन ये सामरिक मुद्दे हैं. वास्तव में, आतंकवाद वैचारिक या राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की एक रणनीति है.
डोभाल साहब ने “राजनीतिक इस्लाम” पर एक सेमिनार पर उद्बोधन देते हुए विस्तार से बताया और पूछा: “तो पाकिस्तान से कैसे निपटें ? आप जानते हैं, हम दुश्मन से तीन तरीकों से निपटते हैं. एक रक्षात्मक तरीका है. अर्थात, आपने देखा होगा कि चोकीदार और चपरासी क्या करते हैं, यानी किसी को अंदर आने से रोकना. यह एक रक्षात्मक आक्रामक है. अपने बचाव के लिए हम उस स्थान पर जाते हैं, जहां से आक्रमण हो रहा होता है. अब हम रक्षात्मक मोड में हैं, अंतिम मोड को आक्रामक मोड कहते हैं. जब हम रक्षात्मक-आक्रामक स्थिति में आते हैं, तो हम पाकिस्तान की कमजोरियों पर काम करना शुरू करते हैं. यह आर्थिक हो सकता है, यह आंतरिक हो सकता है, यह राजनीतिक हो सकता है; यह अंतर्राष्ट्रीय अलगाव हो सकता है, अफगानिस्तान में उनकी नीतियों को हराना, उनके लिए आंतरिक राजनीतिक भूमि सुरक्षा संतुलन को प्रबंधित करना मुश्किल बनाना. यह कुछ भी हो सकता है. “मैं विवरण में नहीं जा रहा हूँ. लेकिन आपको रक्षात्मक मोड से जुड़ाव को बदलने की आवश्यकता है क्योंकि रक्षात्मक मोड में आप मुझ पर 100 पत्थर फेंकते हैं, मैं 90 को रोकता हूँ. लेकिन 10 भी मुझे चोट पहुँचाते हैं और मैं कभी नहीं जीत सकता. क्योंकि, या तो मैं हार जाता हूँ या गतिरोध होता है. आप जब चाहें पत्थर फेंकते हैं, जब चाहें शांति होती है, जब चाहें बातचीत होती है !! रक्षात्मक-आक्रामक में हम देखते हैं कि संतुलन का संतुलन कहाँ पर है..!? उन्होंने कहा: “हमें पाकिस्तान की जरूरत नहीं है. अगर वे आतंकवाद को अपनी राज्य नीति के साधन के रूप में नहीं छोड़ते हैं तो पाकिस्तान को तालिबान समस्या से जूझने दें. दूसरी बात यह है कि आप आतंकवादी संगठनों से कैसे निपटते हैं. तीसरी बात है उन्हें हथियार, धन और जनशक्ति से वंचित करना. अब फंडिंग को काउंटर फंड से नकारा जा सकता है. अगर उनके पास 500 करोड़ का बजट है, तो हम इसे 1,800 करोड़ से मिला सकते हैं. तो वे हमारे पक्ष में होंगे। वे भाड़े के सैनिक हैं । क्या आपको लगता है कि वे महान लड़ाके हैं? नहीं। इसलिए, अधिक गुप्त कदम उठाएं । हम उन्हें धन से मुकाबला करेंगे, हम एक बड़ा देश हैं। इसलिए मुस्लिम संगठनों के बीच काम करें, वे अधिक इच्छुक हैं। कुछ ही बुरे परिवार हैं। अंत में, प्रतिमान बदलाव करें; उच्च तकनीक अपनाएं, और जवाब में, खुफिया संचालित अभियानों के लिए तैयार रहें. इसे ही “डोभाल डाक्ट्रिन” कहते. इसमें और भी बहुत पॉइंट है, लेकिन मैंने उसमें से केवल मुख्य मुख्य बिंदुओं को जोड़ा है, इससे आप लोगों को समझने में और भी आसानी होगी. वर्तमान में सरकार जिस Stand-up चल रही है, ऐसे में, मिलिट्री एक्शन अवश्य होकर रहेगा. सत्ता के शीर्ष पर बैठे उस इंसान को बदला लेने का मतलब अच्छे से पता है..!! वह “खून के बदले खून” वाली धारणा अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से अपना रखा है. यह भी निश्चित है कि भारत यह युद्ध ढाई मोर्चे पर लड़ेगा, जो इस की शुरुआत हो चुकी है….



